Burger Khane Wali Bahu Part 2

साधना: पार्टी नहीं बल्कि तूने जो आज झूट बोला है न कॉलेज में तुम्हारे माँ की बीमार होने का उसको सच करना है इसलिए मैं ये सारे बर्गर लेकर आई हूँ ताकि इन्हें खाकर अपनी तबियल खराब करू ताकि तेरी बात सच हो फिर तू ये बाकि के बचे हुए बर्गर खा कर सो जाना तुझे तो आदत है न बर्गर खा कर सोने की |

कोयल: माँ ये क्या कह रही हो आप अरें वो तो मैंने ऐसे ही बोल दिया था और कुछ सूझ ही नहीं रहा था आपको तो पता है न मुझे कल रात बर्गर खाने नहीं दिया आपने और मुझे उस चक्कर में नींद नहीं आई तो मुझे अपनी कल रात की नींद पूरी करनी के लिए कॉलेज में बर्गर खा कर सोना पड़ा |

साधना: सही है न तूने मेरी कहने पर अपनी आदत तो छोरनी नहीं बर्गर खा कर सोने वाली इसीलिए मुझे ही खुद को बीमार करना पड़ेगा ताकि तुझे झूट न बोलना पड़े |

साधना इनता बोलकर बर्गर खाने लगती है वो लगातार कई सारे बर्गर खा चुकी थी जिससे उसको उलटी होने लगती है अपनी माँ की ऐसी हालत देखकर कोयल रोते हुए कहती है |

कोयल: माँ मुझे माफ़ कर दो मैं आज के बाद कभी बर्गर नहीं खाऊँगी और ना ही खाकर सोउगी साथ ही कभी झूट भीं नहीं बोलूंगी प्लीज आप अपनी तबियत खराब मत करो प्लीज |

अपनी बेटी को सच में पछताते देखकर साधना उसे माफ़ कर देती है और इस बार काफी महनत करके कोयल अपनी ये बर्गर खा कर सोने वाली आदत छोर देती है |

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Falguni की कहानी

फाल्गुनी रोते रोते समुद्र के अन्दर जाती है और डूबने लगती है अभी एक आनंद नाम का लड़का उसे डूबते हुए देख लेता है और मदद करने के लिए उसके साथ ही पानी चला जाता है और फाल्गुनी को बचा कर वापस किनारे पर ले आता है साथ ही उससे बोलता है |

आनंद: क्या हुआ मैडम जो इतनी कम उम्र में खुदखुसी कर रही थी, फाल्गुनी: जब जिंदगी जीने का कोई मकसद ही नहीं रहा तो उस इन्सान की जीने का क्या मतलब है | आनंद: पर क्या हुआ है तुम्हारे साथ जो तुम खुदकुशी करना चाहती हो |

आनद के बार बार पूछने पर फाल्गुनी उसको अपने बारे में बता देती है की आखिर किस तरह से उसका छोटा सा सुखी परिवार था, जिसमे वो अपनी सास दिया और पती निखिल के साथ रहा करती थी |

फाल्गुनी की अभी नयी नयी शादी हुई थी और शादी के कुछ दिनों के बाद फाल्गुनी अपने पति के साथ कश्मीर जाने वाली थी की तभी उसके पति के पास एक इन्सान का फ़ोन आता है और उसकी कॉल आते ही निखिल फाल्गुनी से कहता है |

निखिल: फाल्गुनी अभी मुझे किसी जरुरी काम से जाना पड़ रहा है, जी पर ऐसा कोन सा काम आ गया जो आप घर से बिना कुछ बताये जा रहे है, आकर सब बताऊंगा फ़िलहाल अभी के लिए ये सोच लो की मेरा जाना बहोत जरुरी है तुम्हे कोई सिकायत तो नहीं है न मुझसे, जी नहीं हा पर आराम से जाइये और जल्दी आना मैं आपका इंतज़ार करुँगी, तुम चिंता मत करो मैं जल्दी आ जाऊंगा |

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फाल्गुनी बिना किसी सिकायत के अपने पति को जाने देती है और इसी तरह वक्त बीतता जाता है पर निखिल का कोई आता पता नहीं चलता और न ही उसका कोई फ़ोन आता है और नहीं ही कोई संदेस जिसकी वजह से कुछ लोगो का कहना होता है की निखिल को कहीं कुछ हो तो नहीं गया तो वहीँ कुछ लोगों का मानना था की उसने फाल्गुनी को छोर दिया है |

धीरे धीरे उसके सास ने भी अपने बेटे की आने की आस छोर दी थी साथ ही अपने आस पास के लोगों के ताने सुन कर और अपने बेटे के जाने के गम में दिया अब फाल्गुनी से नफरत करने लगी थी |

ऐसे ही एक दिन फाल्गुनी को अपनी तबियल ठीक नहीं लगती इसीलिए वो थोडा सा आराम करने की सोचती है उसको ऐसे आराम करता हुवा देखकर दिया उसके हातो में झाड़ू देकर बोलती है |

दिया: अरें मनहूस कही की जब से तुम मेरे घर में आई है मेरे घर की सारी खुसिया ही चली गयी है बस मुफ्त में रोटियां तुडवा लो महरानी से क्युकी इनसे काम तो होता नहीं |

फाल्गुनी: “माँ जी सारा काम हो गया” दिया:हो गया हो गया तो ये क्या है अरे अच्छे से साफ़ कर और काम खतम करके मार्किट से जाकर कुछ फल ले आ मनहूस कहीं की |

दिया फाल्गुनी को भला बुरा सुना कर वहां से चली जाती है, वही फाल्गुनी एक बार फिर से सारा काम खतम करके मार्केट जाती है जहाँ पर एक बत्मिज़ लड़का उसका हाथ पकड़ लेता है फाल्गुनी बहोत डर जाती है और जल्दी से अपना हाथ छुराकर वहां से भाग जाती है पर ये सब कुछ उसकी एक पड़ोसन देख लेती है जो तुरंत जाकर दिया को नमक मिर्च लगाकर ये बातें बता देती है | ये सब जानकर दिया फाल्गुनी से कहती है |

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दिया: अरे मनहूस कही की घर में आते ही मेरे बेटे को खा गयी मेरे घर की सारी खुसिया निगल गयी अरे इतना सब करने बाद भी तेरे कलेजे को ठंडक नहीं मिली जो तू पुरे समाज में मेरे घर की इज्जत की धजिया उड़ा रही है |

फाल्गुनी: पर माँ जी मेरी गलती क्या है मैंने तो ऐसा कुछ भी नही किया, दिया: क्या किया तूने अरे मार्किट सब्जी लेने गयी थी या पाप करने गयी थी फाल्गुनी: पर माँ जी गलत तो वो लड़का था जो भरे बाज़ार में मेरा हाथ पकड़ कर मुझे परेसान कर रहा था |

दिया: अरे रहने दे मुझे न सब पता है की तू कितनी चालबाज़ औरत है, ये सब बोल कर दिया वहां से चली जाती है पर फाल्गुनी रोते हुए घर से निकल कर एक समुद्र के पास खुदखुसी करने के लिए चली जाती है जहाँ उसको डूबता हुआ देखकर आनंद उसकी जान बचा लेता है |

फाल्गुनी: बस इन सब से दुखी होकर मैं खुदखुसी करने जा रही थी अरे मैं पूछती हु की खूबसूरत होना कोन सा गुनाह है मेरे पति चले गए सारे जिंदगी मेरे सासु माँ मुझे ताने देते रही, समाज वाले मुझे जीने नहीं देंगे|

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